
दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव के तटीय इलाकों में एक अनोखी क्रांति का सूत्रपात हो चुका है। शुभम मैयर नामक युवा मल्लखंब के प्रति अपनी गहरी निष्ठा के साथ इस प्राचीन भारतीय खेल को यहां की धरती पर जड़ें जमाने में जुटे हैं।
मल्लखंब, जो तलवारबाजी, कुश्ती और योग का अनूठा संगम है, महाराष्ट्र से उत्पन्न होकर सदियों पुराना है। लकड़ी के खंभे या रस्सी पर साधने वाला यह खेल असाधारण शारीरिक क्षमता की मांग करता है। लेकिन इन संघ क्षेत्रों में यह पहले अज्ञात था। शुभम ने इसे बदल दिया।
राष्ट्रीय स्तर के पूर्व प्रतियोगी शुभम पांच वर्ष पूर्व यहां बस गए। युवाओं में फिटनेस का जुनून देखकर उन्होंने निशुल्क प्रशिक्षण शिविर शुरू किए। ‘स्मार्टफोन की लत छोड़कर मल्लखंब अनुशासन सिखाता है,’ वे कहते हैं।
कच्छीगाम गांव से प्रारंभ हुई मुहिम ने अब 15 केंद्रों पर 300 से अधिक प्रशिक्षुओं को जोड़ लिया है। स्थानीय जिमों में खंभे लगे, स्कूलों में पाठ्यक्रम शामिल हुआ। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने पर्यटन बोर्डों का ध्यान खींचा।
चुनौतियां कम नहीं। धनाभाव से अस्थायी उपकरण, गर्मी से कठिनाई। फिर भी जिला चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर शुभम ने सिद्ध कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर अकादमी स्थापना उनका स्वप्न है। इन क्षेत्रों में मल्लखंब अब पुनरुत्थान का प्रतीक बन चुका है।