
भारतीय हॉकी के मैदान पर रूपिंदर पाल सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने देश को गौरवान्वित किया। लेकिन उनकी सफलता की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण है।
अमृतसर के एक साधारण परिवार में जन्मे रूपिंदर का बचपन आर्थिक तंगी से भरा था। पिता पंजाब पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे। हॉकी स्टिक और जूते जुटाने के लिए भी उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी। नंगे पैर खुरदरी जमीन पर प्रैक्टिस करते हुए उन्होंने अपने सपनों को संजोया।
स्थानीय कोचों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। सूरजित हॉकी स्टेडियम में प्रशिक्षण लेते हुए वे जूनियर नेशनल्स में चमके। उनका ड्रैग फ्लिक दुश्मनों के लिए खौफ बन गया। 2009 में अंतरराष्ट्रीय डेब्यू के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
2014 एशियन गेम्स में स्वर्ण, चैंपियंस ट्रॉफी में रजत और अंततः 2021 टोक्यो ओलंपिक में कांस्य। यह पदक 41 साल के सूखे को खत्म करने वाला था। रूपिंदर ने पेनल्टी कॉर्नर से महत्वपूर्ण गोल किए।
सेवानिवृत्ति के बाद वे कोचिंग और कमेंट्री में सक्रिय हैं। उनकी कहानी युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है कि दृढ़ संकल्प से कोई लक्ष्य असंभव नहीं। रूपिंदर पाल सिंह ने साबित कर दिया कि संघर्ष सफलता की सीढ़ी है।