
पाकिस्तान में कुछ अस्थायी स्थिरता तो दिख रही है, लेकिन वास्तविक आर्थिक विकास का कोई संकेत नहीं मिल रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि देश विफल राष्ट्र की दिशा में तेजी से अग्रसर हो रहा है, जहां कर्ज का बोझ, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता ने जकड़ लिया है।
हाल के आईएमएफ के बचाव पैकेज ने विदेशी मुद्रा भंडार में कुछ सुधार किया है। लेकिन इसके बदले में कठोर शर्तें थोपी गई हैं, जिनमें ईंधन और बिजली के दामों में भारी बढ़ोतरी शामिल है। इससे आम जनता में असंतोष फैल रहा है।
आंकड़े निराशाजनक हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में जीडीपी वृद्धि महज 0.3 प्रतिशत रही, जबकि युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने हेतु 7 प्रतिशत की दर जरूरी है। बेरोजगारी बढ़ रही है और रेमिटेंस भी घट रहे हैं।
भ्रष्टाचार के घोटाले संस्थानों पर भरोसा कम कर रहे हैं। राजनीतिक नेताओं पर लगे आरोप व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। सेना का हस्तक्षेप लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है। भारत और अफगानिस्तान से तनाव सुरक्षा खर्च बढ़ा रहा है।
बिना संरचनात्मक बदलाव के – कृषि और कपड़ा से इतर विविधीकरण, शिक्षा में निवेश और घाटा नियंत्रण – पाकिस्तान का पतन अपरिहार्य लगता है। अंतरराष्ट्रीय साझेदार सतर्क हैं। स्थिरता का यह मुखौटा कब तक टिकेगा?