
वैश्विक स्तर पर लैंगिक असमानता के मामले में पाकिस्तान एक कटु सत्य का सामना कर रहा है। प्रबंधन पदों पर महिलाओं की संख्या महज 8 प्रतिशत से भी कम होने के कारण यह देश सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा न केवल सामाजिक कुरीतियों को उजागर करता है बल्कि आर्थिक विकास में बड़ा रोड़ा भी साबित हो रहा है।
दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों की तुलना में पाकिस्तान की स्थिति चिंताजनक है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा की कमी, पितृसत्तात्मक मान्यताएं और कार्यस्थल पर भेदभाव मुख्य कारण हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खराब है जहां महिलाओं को उच्च शिक्षा और नौकरी के अवसरों से वंचित रखा जाता है।
आर्थिक दृष्टि से यह घाटा भारी पड़ रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं की नेतृत्व भूमिका वाले देश नवाचार और लाभप्रदता में आगे रहते हैं। पाकिस्तान में निजी क्षेत्र के अधिकांश पद पुरुषों के कब्जे में हैं जबकि सरकारी प्रयास कागजी ही साबित हो रहे हैं।
महिला अधिकार संगठन कोटा प्रणाली, बाल देखभाल सुविधाओं और लैंगिक संवेदीशील नीतियों की मांग कर रहे हैं। कुछ सफल महिला उद्यमियों की कहानियां प्रेरणा देती हैं लेकिन व्यापक बदलाव के लिए सांस्कृतिक क्रांति जरूरी है। यदि पाकिस्तान अपनी आधी आबादी को सशक्त नहीं बनाएगा तो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ता जाएगा।