
भारत के बीमा क्षेत्र को मजबूती देने वाला एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। नई विधायी व्यवस्था के तहत बीमा कंपनियों में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी दे दी गई है। साथ ही रीइंश्योरेंस नियमों में बड़ी छूट से उद्योग को नई गति मिलेगी।
देश में बीमा घनत्व वैश्विक मानकों से काफी पीछे है। जीडीपी का महज 4 प्रतिशत ही बीमा क्षेत्र में है, जबकि विकसित देशों में यह 10 प्रतिशत से अधिक है। इस नीतिगत बदलाव से विदेशी पूंजी का प्रवाह तेज होगा। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में 10 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश आएगा। अंतरराष्ट्रीय दिग्गज जैसे एलियांज और एक्सए जैसी कंपनियां अब बिना 74 प्रतिशत की सीमा के भारत में विस्तार करेंगी।
रीइंश्योरेंस में बदलाव भी महत्वपूर्ण हैं। पहले सख्त स्थानीयकरण नियमों से कंपनियों पर बोझ था, अब वैश्विक बाजारों तक आसान पहुंच मिलेगी। इससे प्राकृतिक आपदाओं और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे बड़े जोखिमों को कवर करना संभव होगा। आईआरडीएआई ने सॉल्वेंसी मार्जिन को मजबूत रखते हुए ये नियम बनाए हैं।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि स्वास्थ्य, साइबर और जलवायु जोखिम बीमा जैसे उत्पादों में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। डिजिटल क्रांति के दौर में इंश्योरटेक स्टार्टअप्स को विदेशी विशेषज्ञता और फंडिंग से फायदा होगा।
चुनौतियां भी हैं, जैसे साइबर सुरक्षा और नियामक अनुपालन। सरकार को कौशल विकास पर जोर देना होगा। फिर भी, यह सुधार भारत को एशिया का बीमा केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे रोजगार सृजन और आर्थिक गुणक प्रभाव बढ़ेगा, लाखों लोगों को किफायती कवरेज मिलेगा।