
भारत उर्वरक क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है। कुल खपत में घरेलू उत्पादन का हिस्सा अब 73 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह उपलब्धि देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है, जो पहले भारी आयात पर निर्भर थी।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार की नीतियों ने कमाल कर दिखाया है। नई फैक्ट्रियों की स्थापना, पुराने संयंत्रों का आधुनिकीकरण और सब्सिडी सुधारों से उत्पादन क्षमता में जबरदस्त इजाफा हुआ है। पिछले तीन वर्षों में यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों का उत्पादन 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है।
किसानों को इसका सीधा फायदा हो रहा है। स्थानीय उत्पादन से कीमतें स्थिर हुई हैं, वैश्विक उतार-चढ़ाव का असर कम हुआ है और बुआई के मौसम में आपूर्ति बाधित नहीं हो रही। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में फसल उत्पादन बढ़ा है, जिससे किसानों की आमदनी में सुधार आया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019 में घरेलू हिस्सा महज 55 प्रतिशत था, जो अब 73 प्रतिशत हो गया। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना और अनुसंधान ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, कच्चे माल की उपलब्धता और पर्यावरणीय चुनौतियां बाकी हैं।
2030 तक 100 प्रतिशत आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अब करीब नजर आ रहा है। यह मील का पत्थर न केवल आर्थिक बल्कि खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। भारत की कृषि नींव अब मजबूत हो रही है।