
पाकिस्तान में महिलाओं के लिए चिकित्सा सुविधाएं हासिल करना डर और कागजी कार्रवाई की दोहरी मार से लगभग असंभव हो गया है। एक नई रिपोर्ट ने इस संकट को उजागर किया है, जिसमें संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों का खुलासा किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पختूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में आतंकी धमकियां चिकित्सा संस्थानों पर हमलों के रूप में सामने आ रही हैं। वहीं, वीजा और मेडिकल क्लीयरेंस के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। क्वेट्टा की एक 32 वर्षीय महिला का मामला दिल दहला देने वाला है, जिसका ओवेरियन कैंसर का इलाज वीजा देरी से नहीं हो सका।
विशेषज्ञों का कहना है कि सांस्कृतिक बाधाएं और सुरक्षा प्रोटोकॉल महिलाओं को घर से बाहर निकलने से रोकते हैं। लाहौर की डॉ. आयशा खान बताती हैं, ‘बम विस्फोटों के बाद मरीज अपॉइंटमेंट कैंसल कर देते हैं, और कागजातों की भरमार हफ्तों ले लेती है।’ सरकार 15,000 से अधिक मेडिकल वीजा जारी करने का दावा करती है, लेकिन प्रक्रिया जटिल बनी हुई है।
एनजीओ कानूनी सहायता और सुरक्षित परिवहन दे रहे हैं, लेकिन दायरा सीमित है। रिपोर्ट में वीजा प्रक्रिया सरलीकरण, महिलाओं के लिए विशेष गलियारों और अस्पतालों की सुरक्षा बढ़ाने की मांग की गई है। बिना सुधारों के, हजारों महिलाएं इस स्वास्थ्य संकट की भेंट चढ़ सकती हैं।