
शेयर बाजार की दुनिया में बड़े-बड़े सौदे रोजाना होते हैं, लेकिन बल्क डील और ब्लॉक डील जैसे लेन-देन बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। निवेशकों के लिए इनका ज्ञान अनिवार्य है, क्योंकि ये सौदे शेयरों की कीमतों पर गहरा असर डाल सकते हैं।
बल्क डील तब होती है जब कोई निवेशक या संस्था एक ही दिन में कम से कम 10 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर या कंपनी की कुल इक्विटी का 0.5 प्रतिशत से अधिक खरीदता या बेचता है। ये सौदे एक्सचेंज पर ही होते हैं, लेकिन सामान्य ट्रेडिंग विंडो के बाहर, विशेष समय स्लॉट्स में। बाजार बंद होने के बाद इनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाती है, जिसमें खरीदार-विक्रेता, मात्रा और औसत मूल्य शामिल होता है।
वहीं ब्लॉक डील दो पक्षों के बीच निजी तौर पर तय की जाती है। न्यूनतम 10 करोड़ रुपये या 5 लाख शेयरों का लेन-देन विशेष 15 मिनट की ट्रेडिंग विंडो में होता है। यहां कीमतें संदर्भ मूल्य के 1 प्रतिशत बैंड में तय होती हैं। गोपनीयता बनी रहती है, लेकिन बाद में खुलासा जरूरी है।
मुख्य अंतर निष्पादन, पारदर्शिता और मूल्य निर्धारण में है। बल्क डील में दिन का औसत मूल्य लगता है, जबकि ब्लॉक में बातचीत होती है। ये सौदे अक्सर प्रमोटरों के स्टेक बिक्री या संस्थागत निवेश को दर्शाते हैं। उदाहरणस्वरूप, हालिया अडानी ग्रुप की बल्क डील्स ने बाजार में विश्वास जगाया।
निवेशकों को इनकी निगरानी NSE-BSE वेबसाइट्स से करनी चाहिए। ये डील्स वॉल्यूम स्पाइक्स या प्राइस मूवमेंट्स का संकेत देती हैं। SEBI के नियम इनकी पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।
संक्षेप में, बल्क और ब्लॉक डील्स बाजार की पाठशाला का हिस्सा हैं। इन्हें समझें, तो जोखिम कम और अवसर ज्यादा मिलेंगे।