
23 जनवरी को पूरे भारत में बसंत पंचमी का पावन पर्व मनाया जाएगा, जब भक्त मां सरस्वती की आराधना में लीन होंगे। लेकिन झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ मंदिर में इस दिन कुछ विशेष होता है। यहां तिलकोत्सव के साथ भगवान शिव की बारात का न्योता देने की अनूठी परंपरा शुरू होती है, जो शिवरात्रि तक धूमधाम से चलती रहती है।
12 ज्योतिर्लिंगों में शुमार बाबा बैद्यनाथ धाम अपनी भव्यता और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। सावन और शिवरात्रि पर लाखों भक्तों का जमावड़ा लगता है, लेकिन बसंत पंचमी बाबा के विवाह की पहली रस्म का प्रारंभिक बिंदु है। मिथिलांचल की महिलाएं, जो स्वयं को मां पार्वती के रिश्तेदार मानती हैं, मिठाइयों, फूलों और मालाओं से लैस होकर मंदिर पहुंचती हैं।
पूजा के बाद बाबा को बेलपत्र और फूलों से सजाया जाता है। गर्भगृह में तिल, लड्डू, घी और लाल गुलाल का भोग चढ़ाया जाता है। महिलाएं एकत्र होकर तिलक लगाती हैं। त्रेता युग से चली आ रही यह रस्म पहले संत-मुनि निभाते थे, अब आम जन ‘तिलकहरु’ बनकर इसमें शरीक होते हैं।
पौराणिक मान्यता है कि यहां मां सती का हृदय गिरा था, इसलिए इसे शिव-पार्वती का मिलन स्थल माना जाता है। मनोकामना शिवलिंग के रूप में पूजे जाने वाले बाबा के दर्शन के लिए हर साल लाखों भक्त आते हैं। इस बसंत पंचमी पर तिलकोत्सव भक्ति का अनुपम संगम बनेगा।