
सर्दी के अंतिम दिनों में जब सरसों के खेत पीले पड़ जाते हैं, तब बसंत पंचमी का आगमन होता है। यह पर्व न केवल मां सरस्वती की पूजा का दिन है, बल्कि होली के रंगीन उत्सव की शुरुआत भी यहीं से मानी जाती है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और ऋतु चक्र के गहन संबंध को समझने के लिए让我们 खोजें इस परंपरा की जड़ें।
माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला यह त्योहार ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती को समर्पित है। पीले वस्त्र धारण कर, केसरिया खीर और ग्राम के व्यंजन बनाकर भक्तजन प्रार्थना करते हैं। इसी दिन वसंत ऋतु का राजा आगमन करता है, जो शिशिर की ठंड को विदा कहकर फूलों की बहार लाता है।
होली की तैयारियां बसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाती हैं। पुराणों में वर्णित होलिका दहन की कथा इसी मौसमी परिवर्तन से जुड़ी है। फाल्गुन के फूल इकट्ठा करना, रंग बनाना और लठ्ठमार होली की योजना यहीं से बनती है। भगवान कृष्ण की लीला भी इसी समय से प्रारंभ मानी जाती है।
मौसम विज्ञान की दृष्टि से भी यह उचित है। पंचमी के बाद तापमान बढ़ता है, पलाश-टेसू फूलते हैं जो प्राकृतिक रंग प्रदान करते हैं। किसान फसल की बालाई का उत्सव मनाते हैं। आयुर्वेद में इस समय डिटॉक्स के लिए होली के रीति-रिवाज सुझाए गए हैं।
आज के दौर में शहरों से लेकर गांवों तक यह परंपरा जीवंत है। स्कूलों में सरस्वती पूजा के बाद होली की धूम मचती है। इस प्रकार बसंत पंचमी होली का प्रारंभिक स्पार्क है, जो धर्म और प्रकृति के सामंजस्य को दर्शाता है। जीवन के चक्र को उत्सवों से जोड़कर हम अपनी जड़ों से जुड़ते हैं।