
आयुर्वेद में भोजन को जीवन का मूल आधार बताया गया है। विशेष रूप से रात्रि का भोजन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। रात में भोजन करना चाहिए या नहीं, इस सवाल का उत्तर आयुर्वेद हल्के-फुल्के भोजन से देता है। सही समय पर सुपाच्य भोजन लेने से आयु बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है।
भारी आहार तामसिक प्रवृत्ति बढ़ाता है, जो मन को सुस्त कर देता है। अनियमित भोजन अग्नि को कमजोर करता है, जिससे दीर्घकालिक रोग उत्पन्न होते हैं। गर्म ताजा भोजन संक्रमणों से रक्षा करता है।
हर व्यक्ति के लिए संपूर्ण उपवास की सिफारिश नहीं है। कमजोर पाचन वाले लोग थोड़ा हल्का भोजन अवश्य लें। उपवास विशेषज्ञ सलाह पर ही करें।
मुख्य सिद्धांत है अग्नि संरक्षण। दिन में सूर्य अग्नि को प्रज्वलित रखता है, रात्रि में यह मंद पड़ जाती है। इसलिए भारी भोजन हानिकारक। चरक संहिता कहती है- रात्रि में लघु स्निग्ध भोजन। अष्टांग हृदय में- रात्रौ लघु भोजन।
आधुनिक विज्ञान भी सहमत: रात में चयापचय धीमा, भारी तला-मिठा पचाना कठिन। इससे अपच, गैस, मोटापा, नींद भंग।
सुझाव: मूंग खिचड़ी, हल्की दाल-सब्जी, रोटी, दलिया, सूप, गर्म दूध। परहेज: दही, मांस, तला, मिठाई, बासी।
समय: सूर्यास्त के 2-3 घंटे में, सोने से 2 घंटे पूर्व। आदर्श 6-8 बजे। इससे पाचन सुचारू, नींद गहन।