
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा आई-पैक कार्यालयों पर छापेमारी के विवाद ने तूल पकड़ लिया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में केविएट दाखिल कर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है। यह कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के ईडी की कार्रवाई की जांच के आदेश के बाद उठाया गया।
केविएट दाखिल करने का मतलब है कि कोई भी पक्ष अगर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है तो राज्य सरकार को पहले सुनवाई का मौका मिलेगा। राज्य का कहना है कि केंद्र की एजेंसियां राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही हैं।
आई-पैक, प्रशांत किशोर की फर्म है, जिसने 2021 विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मजबूत रणनीति दी थी। ईडी का आरोप है कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) और मनी लॉन्ड्रिंग कानून के उल्लंघन में करोड़ों की अवैध फंडिंग हुई। छापों में दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए।
ममता बनर्जी सरकार ने इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार दिया। कानून मंत्री मोलॉय घटक ने कहा, ‘यह विपक्ष को दबाने की साजिश है।’ वहीं, बीजेपी ने छापों का समर्थन करते हुए कहा कि चुनावी धांधली उजागर हो रही है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह केविएट रणनीतिक कदम है, जो राज्य को अप्रत्याशित फैसलों से बचाएगा। मामला केंद्र-राज्य संबंधों और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता पर बहस छेड़ सकता है।
लोकसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में यह विवाद राजनीतिक तापमान बढ़ा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले को नई दिशा दे सकता है, जो पूरे देश के लिए मिसाल बनेगा। पश्चिम बंगाल की यह चाल निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनी हुई है।