उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारत के बौद्धिक विकास की राह में स्वतंत्र मानसिकता को सबसे महत्वपूर्ण बताया है। एक प्रमुख समारोह में अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता और पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति पाकर ही देश अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित कर सकता है।

धनखड़ ने नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत का इतिहास स्वतंत्र चिंतन और बहस पर आधारित रहा है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे दिए गए ज्ञान को बिना सवाल किए स्वीकार न करें, बल्कि तर्क और प्रमाण के आधार पर विश्लेषण करें।
आज के भारत की उपलब्धियों—चंद्रयान मिशन, कोविन प्लेटफॉर्म और स्टार्टअप इकोसिस्टम—को उन्होंने स्वतंत्र बुद्धि का परिणाम बताया। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि रटंत शिक्षा और सामाजिक दबाव बौद्धिक प्रगति के दुश्मन हैं।
उपराष्ट्रपति ने शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और नागरिकों से वातावरण बनाने का आह्वान किया जहां असहमति को सम्मान मिले। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा का उदाहरण देते हुए दिखाया कि स्वतंत्र सोच ही सफलता की कुंजी है।
अमृत काल में भारत के विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार करने के लिए धनखड़ का संदेश प्रेरणादायक है। स्वतंत्र मानसिकता ही वह ईंधन है जो देश को वैश्विक ज्ञान केंद्र बना सकता है।
