
नई दिल्ली। मौत की सजा को फांसी के बजाय कम पीड़ादायक तरीके से देने की मांग वाली महत्वपूर्ण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया, जो देश के दंड व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।
यह याचिका 2017 में वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दायर की थी। उन्होंने फांसी को क्रूर और अमानवीय बताया, जिसमें दोषी को लंबे समय तक कष्ट सहना पड़ता है। मल्होत्रा ने लीथल इंजेक्शन का सुझाव दिया, जो तेजी से और बिना दर्द के मौत लाता है। याचिका में दोषियों को विकल्प देने की मांग की गई है कि वे फांसी चुनें या इंजेक्शन।
सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने बताया कि इस विषय पर एक समिति गठित की गई है, जो अन्य तरीकों का अध्ययन कर रही है। लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में फांसी सबसे सुरक्षित और त्वरित विधि है, इसलिए बदलाव का विरोध किया।
कोर्ट ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। बेंच ने कहा कि संविधान जीवंत दस्तावेज है और समय के साथ बदलाव अनिवार्य है। सम्मानजनक मौत का अधिकार मौलिक अधिकारों का हिस्सा होना चाहिए।
कई सुनवाइयों के बाद अदालत ने तीन सप्ताह में लिखित जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में अभी फांसी ही तरीका निर्धारित है। कई देशों ने इंजेक्शन अपना लिया है। यह फैसला दंड प्रक्रिया को मानवीय बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।