
प्रयागराज के पावन माघ मेले में ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्यों के साथ पुलिस के कथित हंगामे ने देशव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया है। मौनी अमावस्या के राजसी स्नान के दौरान घटी इस घटना के खिलाफ शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें संवैधानिक अधिकारों के हनन का गंभीर आरोप लगाया गया है।
वकील उज्ज्वल गौर द्वारा प्रस्तुत इस याचिका में अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन बताते हुए पुलिस की मनमानी को कटघरे में खड़ा किया गया है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि शंकराचार्य की पालकी रोकी गई, शिष्यों को धक्के मारे गए, ब्राह्मण छात्रों की शिखा पकड़कर घसीटा गया। यह नजारा धार्मिक आस्थाओं पर करारा प्रहार है।
याचिका का मूल बिंदु यह है कि धार्मिक आयोजनों में संतों-शंकराचार्यों के साथ पुलिस व्यवहार के लिए कोई मानक प्रक्रिया नहीं है, जिससे स्वेच्छाचारिता बढ़ रही है। इससे न केवल संतों का अपमान हो रहा, बल्कि कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।
कोर्ट से मांगा गया है कि माघ मेला जैसे किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में शंकराचार्यों के लिए स्थायी एसओपी बने, जिसमें पालकी का सम्मानजनक प्रवेश, राजसी स्नान की सुविधा और सुरक्षा के प्रावधान हों। सरकारी अतिक्रमण की शिकायतों के लिए त्वरित निवारण तंत्र भी स्थापित हो, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
घटना तब भड़की जब संगम स्नान के लिए जा रहे शंकराचार्य को बैरिकेडिंग ने रोका। शिष्यों के विरोध पर झड़प हुई। आहत स्वामी ने 10-11 दिनों तक धरना व अनशन किया, फिर बिना स्नान के 28 जनवरी को वाराणसी लौट गए। उन्होंने योगी सरकार पर नकली हिंदुओं को प्रोत्साहन देने का इल्जाम लगाया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला लाखों भक्तों की आस्था का रक्षक बनेगा। यह केस धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक संयम के बीच संतुलन सिखा सकता है।