
दार्जिलिंग की मनमोहक वादियों में खुली जीप पर सवार राजेश खन्ना का ‘मेरे सपनों की रानी’ गीत आज भी सिनेप्रेमियों के दिलों में बसा है। लेकिन जीप की कमान संभाले उस शख्स पर कम ही नजरें ठहरती हैं, जो थे सुजीत कुमार। बॉलीवुड के वफादार साथी से पूर्वांचल की धरती के सुपरस्टार बनने तक का उनका सफर प्रेरणादायक है।
7 फरवरी 1934 को वाराणसी के चकिया में किसान परिवार में जन्मे शमशेर बहादुर सिंह उर्फ सुजीत कुमार कानून की पढ़ाई कर रहे थे। नाटक के मंच पर फणी मजूमदार की नजर उन पर पड़ी और मुंबई का रास्ता बन गया। 1960 के दशक में ‘लाल बंगला’ जैसी थ्रिलर फिल्मों ने उन्हें स्थापित किया, तो ‘बिदेसिया’ ने भोजपुरी में अमर कर दिया।
1977 में भोजपुरी सिनेमा संकट में था। सुजीत ने ‘दंगल’ से क्रांति लाई—पहली रंगीन फिल्म, जिसका ‘काशी हिले पटना हिले’ आज भी धूम मचाता है। मॉरीशस-फिजी तक धाक जमाई। राजेश खन्ना के साथ ‘आराधना’, ‘अमर प्रेम’ जैसी 12 हिट फिल्मों में लकी चार्म बने।
पुलिस अफसर की भूमिकाओं में भी छाए, साथ ही पत्नी किरण के साथ ‘शिव भक्ति फिल्म्स’ से ‘खेल’, ‘चैंपियन’ जैसी फिल्में दीं। ‘पान खाए सैयां हमार’ में अमिताभ-रेखा के कैमियो ने सम्मान दिखाया। जितेंद्र-राकेश रोशन के साथ ‘जुहू सर्कल’ की यारी मशहूर।
2007 में कैंसर ने घेरा, 5 फरवरी 2010 को 76 की उम्र में अलविदा। भोजपुरी लाइफटाइम अवॉर्ड से नवाजे गए। सुजीत कुमार क्षेत्रीय सिनेमा के पितामह बने रहे।