
राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति ने केंद्रीय बजट चर्चा में अमेरिका यात्राओं के दो विपरीत अनुभव साझा कर भारत की बदली वैश्विक छवि को रेखांकित किया। 1979 की पहली यात्रा में वीजा और कस्टम अधिकारियों ने उन्हें संदेहास्पद नजरों से देखा। कारण, पति का वेतन, वापसी टिकट जैसे सवालों की बौछार ने 28 वर्षीय युवती को असहज कर दिया। कस्टम पर साड़ी देख अधिकारी बोले, ‘ये क्या पहन रखा है?’ जवाब मिला ‘साड़ी’, तो पूछा ‘भारत में सड़कों पर सांप घूमते हैं?’ मूर्ति ने कहा, ‘जादूगर कम होते हैं।’
तीन महीने का वीजा बिना कारण ठोंक दिया गया। अब हालिया यात्रा में तस्वीर उलट। अधिकारियों ने भारत, बेंगलुरु, भारतीयों की उद्यमशीलता, मेहनत, कानूनपालन व संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मूर्ति ने इसे स्थिर सरकार, साहसिक बजट, मजबूत अर्थव्यवस्था व सांस्कृतिक गौरव वाले नेतृत्व का श्रेय दिया।
निर्मला सीतारमण के नौवें बजट पर बधाई, महिला के रूप में गर्व का विषय। संस्कृति-पुरातत्व प्रावधान सराहे, ‘प्रोजेक्ट मौसम’ के तहत पुरी-कोणार्क में 39 देशों का सम्मेलन सुझाया। ‘शी-मार्केट’ की तारीफ, लेकिन स्वावलंबी, सुरक्षित, प्रकाशयुक्त, मातृसुविधा संपन्न व ग्राह्यस्थलों पर हों। जिला-स्तरीय महिला छात्रावास शौचालय व आवास से जीवन बदलेंगे। चुनौतियां हैं, पर सही नीतियां भारत को शिखर दिलाएंगी।