राजनीतिक विश्लेषक शौर्या सिंह ने भाजपा पर महिला आरक्षण विधेयक को लेकर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विधेयक न तो इतनी जल्दी संसद में आएगा और न ही सत्तारूढ़ दल इसे लागू करने में सक्षम है। हालिया एक सार्वजनिक सभा में सिंह ने इस सुधार को लंबे समय से लटकाए रखने की राजनीतिक चालों पर प्रकाश डाला।

महिला आरक्षण विधेयक, जो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है, 1996 से चर्चा का विषय बना हुआ है। भाजपा सरकार ने इसे चुनावी वादों में प्रमुखता दी, लेकिन व्यावहारिक कदम नदारद हैं। सिंह ने कहा, “महिलाओं के सशक्तिकरण के दावे खोखले साबित हो रहे हैं।”
विधेयक को जनगणना और परिसीमन जैसे शर्तों से जोड़ना सिंह के अनुसार जानबूझकर की गई देरी है। विपक्षी दल और महिला संगठन लगातार दबाव बना रहे हैं, लेकिन संसदीय समितियों में यह अटका पड़ा है। सिंह ने चेतावनी दी कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा भाजपा के लिए मुसीबत बन सकता है।
सिंह ने सभी दलों से आम सहमति बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक सशक्तिकरण तभी संभव है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रबल हो। महिलाओं की बढ़ती जागरूकता इस दिशा में सकारात्मक संकेत है।
यह विवाद भारतीय लोकतंत्र की व्यापक चुनौतियों को उजागर करता है, जहां वादे अक्सर पूरे नहीं होते। लाखों महिलाएं एक ऐसे सुधार का इंतजार कर रही हैं जो राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है।
