
पटना, 23 जनवरी। मातृ उद्बोधन आश्रम के निदेशक सत्येंद्र जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के आचरण पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि धर्मगुरु का प्रथम पाठ अनुशासन है, जो शंकराचार्य पद की मर्यादा को परिभाषित करता है। स्थापित व्यवस्था का सहयोग कर धर्म को बढ़ावा देना ही उनका ध्येय होना चाहिए, लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद इससे विमुख हैं।
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा चार मठों की स्थापना धर्म रक्षा के लिए की गई थी। अन्य तीन शंकराचार्य विवादों से दूर रहते हैं, पर अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार विवादास्पद हो जाते हैं। सत्येंद्र जी ने उन्हें समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का एजेंट करार दिया। प्रयागराज के माघ मेला में 17 जनवरी को मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के लिए पालकी पर पहुंचे अविमुक्तेश्वरानंद को प्रशासन ने बिना रथ के जाने को कहा। इससे झड़प हुई और उन्होंने धरना दे दिया।
सत्येंद्र जी ने सवाल उठाया कि अन्य शंकराचार्य माघ मेले क्यों नहीं गए? पालकी पर अड़े रहना अनुशासनहीनता है। स्वयंभू शंकराचार्य कहे जाने पर उन्होंने चेतावनी दी कि व्यवस्था का पालन न करने पर सरकार कार्रवाई करेगी।
यह विवाद कुंभ जैसे विशाल आयोजन में परंपरा और प्रशासन के बीच संतुलन की याद दिलाता है। सच्चे संत व्यवस्था के साथ चलकर ही धर्म की रक्षा करते हैं। सत्येंद्र जी का बयान धार्मिक नेतृत्व के लिए आईना है।