
भारतीय कूटनीति के क्षेत्र में एस जयशंकर का नाम एक मिसाल है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पसंदीदा माने जाने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें कभी उचित महत्व नहीं दिया। वहीं, नरेंद्र मोदी ने 2019 में बिना किसी चुनाव लड़े उन्हें सीधे विदेश मंत्री बना दिया।
जयशंकर का सफर भारतीय विदेश सेवा से शुरू हुआ। 2009 में मनमोहन सिंह ने उन्हें विदेश सचिव बनाने की इच्छा जताई, खासकर अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील के दौरान उनकी भूमिका को देखते हुए। लेकिन कांग्रेस के आंतरिक समीकरणों ने उन्हें दरकिनार कर दिया। इसके बाद वे अमेरिका व चीन में राजदूत बने, जहां उन्होंने भारत के हितों को मजबूती से संभाला।
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार में जयशंकर का प्रवेश ऐतिहासिक था। गुजरात से राज्यसभा सदस्य बने और विदेश मंत्रालय की कमान संभाली। कोविड महामारी में वैक्सीन मैत्री, लद्दाख में चीन के साथ तनाव, क्वाड गठबंधन—हर मोर्चे पर उनकी रणनीति ने भारत को मजबूत स्थिति दिलाई।
जयशंकर का ‘भारत प्रथम’ दृष्टिकोण वैश्विक मंचों पर गूंजता है। जी20 से ब्रिक्स तक, वे पश्चिमी दबावों का करारा जवाब देते हैं। विपक्ष उन्हें ‘पैराशूट’ नेता कहता है, लेकिन उनकी विशेषज्ञता पर कोई सवाल नहीं उठाता।
आज जब विश्व ध्रुवीयता की ओर अग्रसर है, जयशंकर मोदी के विजन को साकार कर रहे हैं। यह कहानी योग्यता की जीत है, जो राजनैतिक वंशवाद पर भारी पड़ती है। भारत का वैश्विक कद इससे और ऊंचा हो रहा है।