
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे के दौरान हुई घटनाओं पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रपति का पद राजनीतिक विवादों से परे है और यह देश की सर्वोच्च संवैधानिक गरिमा का प्रतीक है। दार्जिलिंग जिले में संथाल सम्मेलन के आयोजन में आई बाधाओं को उन्होंने पूरे राष्ट्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
राष्ट्रपति मुर्मू सिलीगुड़ी के फांसीदेवा क्षेत्र पहुंचीं, लेकिन वहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या कोई मंत्री स्वागत के लिए उपस्थित नहीं हुए। यही नहीं, बिधाननगर में प्रस्तावित मुख्य कार्यक्रम को सुरक्षा के नाम पर अंतिम क्षणों में रद्द कर गोशाईपुर की संकरी जगह पर स्थानांतरित कर दिया गया। इससे स्थानीय संथाल समुदाय के लाखों लोग कार्यक्रम से वंचित रह गए।
कार्यक्रम स्थल पर संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, ‘यह क्षेत्र इतना विशाल है कि पांच लाख लोग आसानी से समा सकते थे। प्रशासन ने आखिर क्यों हमें इतनी दूर ले जाया? शायद सोचा हो कि कोई न आए और राष्ट्रपति चली जाएं।’ उन्होंने ममता बनर्जी को अपनी छोटी बहन बताते हुए प्रोटोकॉल उल्लंघन पर दुख व्यक्त किया।
रिजिजू ने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति के वीडियो को साझा करते हुए लिखा, ‘आदिवासी राष्ट्रपति का अपमान आदिवासी अस्मिता और संविधान पर हमला है। यह पश्चिम बंगाल और पूरे भारत के लिए शर्मनाक है।’ उनकी यह टिप्पणी केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव को और उजागर करती है।
यह विवाद भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच जारी जंग का हिस्सा लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार ने जानबूझकर राष्ट्रपति की आदिवासी समुदाय से नजदीकी को कम करने की कोशिश की। इस घटना ने संवैधानिक पदों के सम्मान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक लाभ के चक्कर में ऐसी गलतियां देश की एकता को नुकसान पहुंचाती हैं।