
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में बसा राजराजेश्वरी मंदिर हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में शुमार है। दस महाविद्याओं में प्रमुख मां राजराजेश्वरी यहां सौंदर्य और आनंद की स्वरूप में विराजमान हैं। दक्षिण भारत के उग्र देवी रूपों से अलग, यह मंदिर शांत और सौम्य पूजा परंपरा का प्रतीक है। भक्त दूर-दूर से तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए आते हैं, जहां यज्ञ-हवन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मंदिर का गर्भगृह 51 शक्तिशाली यंत्रों से सुसज्जित है, जो इच्छापूर्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी कारण इसे 51 शक्तिपीठों के समकक्ष माना जाता है। मां को ललिता, त्रिपुरासुंदरी और षोडशी नाम से भी पूजा जाता है। मेरु यंत्र पर विराजमान मां के हाथों में शंख, चक्र, धनुष हैं, दाईं ओर सरस्वती और बाईं ओर लक्ष्मी स्थापित हैं। दीवारों पर नवग्रहों की नक्काशी आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है।
राहु दोष से पीड़ित जातकों के लिए विशेष 18 सप्ताह का राहु काल दीपम अनुष्ठान यहां आयोजित होता है। देसी घी और नींबू के दीप प्रतिदिन जलाए जाते हैं, चंडी होमम और परिक्रमा की जाती है। ऐसा करने से राहु का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है।
दशहरा यहां भव्य रूप से मनाया जाता है। रात-दिन पूजन, भजन और मेला आयोजित होता है, जो मां के राक्षस वध की विजय का प्रतीक है।
मंदिर की स्थापना की कथा पीठाधिपति अरुल ज्योति नागराज से जुड़ी है। विजयवाड़ा जाते हुए दुर्गामित्ता में देवी की उपस्थिति अनुभव कर उन्होंने शिष्यों से मंदिर बनवाया। बाद में सुब्रह्मण्येश्वर स्वामी, सुंदरेश्वर स्वामी, गायत्री देवी और विनायक के उप-मंदिर बने।
यह मंदिर तंत्र विद्या, राहु शांति और मनोकामना पूर्ति का प्रमुख केंद्र है, जहां भक्तों को चमत्कारिक लाभ मिलता है।