
तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों की तैयारी जोरों पर है और इसी बीच पत्ताली मक्कल काची (पीएमके) के संस्थापक एस. रामदास गठबंधन की खींचतान में फंस गए हैं। सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) ने पीएमके को अपने पाले में लाने के लिए दबाव तेज कर दिया है।
उत्तरी तमिलनाडु में वन्नियार समुदाय की प्रमुख पार्टी पीएमके हमेशा से गठबंधनों की पहली पसंद रही है। रामदास, जो औपचारिक रूप से नेतृत्व अपने बेटे अंबुमणि को सौंप चुके हैं, फिर भी पार्टी के फैसलों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हालिया बैठकों से पता चलता है कि डीएमके ने सीट बंटवारे और मंत्रिमंडल जिम्मेदारियों के आकर्षक प्रस्ताव रखे हैं।
हालांकि, पीएमके के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। हिंदुत्व समर्थक गुट डीएमके से गठजोड़ का विरोध कर रहा है, पुरानी दुश्मनी का हवाला देते हुए। रामदास का दुविधा का क्षण है—डीएमके के साथ जाना समर्थकों को नाराज कर सकता है, तो इंकार करने से पार्टी अलग-थलग पड़ सकती है।
सूत्रों के अनुसार, डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया है। थोलुदुर स्थित पीएमके मुख्यालय पर दूत भेजे गए हैं। 2021 के चुनावों में अकेले लड़े पीएमके को सिर्फ एक सीट मिली थी, इसकी याद दिलाई जा रही है।
रामदास की चुप्पी के पीछे तीखी चर्चाएं चल रही हैं। युवा नेता भाजपा के साथ गठबंधन की पैरवी कर रहे हैं। डीएमके की सत्ता और कल्याण योजनाएं आकर्षक हैं।
पीएमके के 5-7 प्रतिशत वोट 25-30 सीटों पर निर्णायक हैं। डीएमके-पीएमके गठबंधन से सत्ताधारी मोर्चे को मजबूती मिलेगी। उम्मीदवारों की घोषणा से पहले रामदास का फैसला तमिलनाडु की सियासत बदल सकता है।