
स्वतंत्र भारत के गौरवपूर्ण अध्याय में एक ऐसा क्षण जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुलासा किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण उनके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य था। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान कही गई यह बात उनके प्रारंभिक संघर्षों और सांस्कृतिक जागरण की गहरी प्रतिबद्धता को उजागर करती है।
गुजरात के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग मंदिर सदियों की लूट और विध्वंस का साक्षी रहा। गजनवी से लेकर अन्य आक्रमणकारियों तक ने इसे बार-बार ध्वस्त किया। 1947 के बाद सरदार पटेल के नेतृत्व में पुनर्निर्माण शुरू हुआ, लेकिन पूर्णता के लिए आवश्यक था वह उत्साह जो युवा मोदी ने संघ के माध्यम से प्रदान किया।
पर्व के संबोधन में मोदी जी ने कहा, ‘सोमनाथ का पुनर्निर्माण मेरे जीवन का लक्ष्य था।’ यह केवल शब्द नहीं, बल्कि स्वाभिमान की भावना थी जो 1951 के प्राण प्रतिष्ठा के साथ साकार हुई। आज यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि पर्यटन और विकास का प्रतीक भी।
स्वाभिमान पर्व इस विजय को याद दिलाता है, जहां व्यक्तिगत समर्पण राष्ट्रीय गौरव से जुड़ता है। मोदी जी के नेतृत्व में मंदिर परिसर आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो चुका है, जो उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण है। यह कथा हमें सिखाती है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान ही राष्ट्र का आधार है।