
राजस्थान के चूरू जिले से 55 किलोमीटर दूर आसपालसर गांव की पाना देवी ने जीवन की कठिन चुनौतियों को पार कर नई मिसाल कायम की है। मात्र 12 साल की उम्र में शादी, 15 साल में मां बनना, आर्थिक संकट और शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज वे न केवल स्नातक हैं, बल्कि दर्जनों महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं।
बचपन में पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई हुई। शादी के दो साल बाद ससुराल आईं और जल्द ही दो बेटों की मां बनीं। घर की तंगहाली ने उन्हें नरेगा में मजदूरी के लिए मजबूर किया। भारी कामकाज के दौरान पढ़ाई की कमी खलती। इसी चाहत ने उन्हें आगे बढ़ाया। पिता के सहयोग से आठवीं पास कीं, लेकिन आंगनबाड़ी का चयन न हुआ।
2016 में राजीविका ने जीवन बदला। समूह सखी बनीं, प्रशिक्षण लिया, 2250 रुपये मानदेय पाया। छोटे लोन से सिलाई मशीन ली और ओपन बोर्ड से दसवीं पास कीं—पहली कोशिश असफल रही, लेकिन दूसरी में सफल। फिर बारहवीं और ग्रेजुएशन पूरा किया। नरेगा में मेठ बनीं, आत्मविश्वास बढ़ा।
सेनेटरी नैपकिन उत्पादन शुरू किया। छोटी मशीन से परेशानी हुई तो ग्रामीण विकास अधिकारी दुर्गा ढाका ने कलेक्टर सिद्धार्थ सियाग से अपील की। कलेक्टर ने बजट से बड़ी मशीन दी। अब 20 महिलाएं यूनिट में कार्यरत हैं।
पाना ने 40 महिलाओं को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया, 13 के फॉर्म खुद भरे। सात-आठ जिलों में सैकड़ों को प्रशिक्षित किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात जीवन का सम्मानजनक पल।
‘संघर्ष अब ताकत देता है,’ कहती हैं पाना। अधिकारी प्रियंका चौधरी व मंजू बोलीं—हौसला हो तो सफलता निश्चित। पाना ने न सिर्फ अपना, कई महिलाओं का जीवन रोशन किया।