
पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच युद्ध की लपटें तेज हो गई हैं, जिससे सोमवार को वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में 7 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर सैन्य हमलों के बाद यह उछाल आया है, जो ऊर्जा बाजारों में भय पैदा कर रहा है।
ब्रेंट क्रूड के वायदा भाव 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। ब्रेंट तेल 7.60 प्रतिशत चढ़कर 78.41 डॉलर और डब्ल्यूटीआई क्रूड 7.19 प्रतिशत बढ़कर 71.86 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ।
ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने से दुनिया भर के देश और रिफाइनरियां अपने स्टॉक का मूल्यांकन कर रही हैं। इस मार्ग से वैश्विक तेल का 20 प्रतिशत और भारत के 40 प्रतिशत से ज्यादा आयात होता है।
ओपेक ने अगले महीने से उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया है। सऊदी अरब व रूस के नेतृत्व में 2.06 लाख बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त उत्पादन होगा, लेकिन विश्लेषकों को इसमें ज्यादा राहत नजर नहीं आ रही।
यह घटना भू-राजनीतिक संकट का रूप ले चुकी है, जिससे तेल का रिस्क प्रीमियम बढ़ा है। सोना-चांदी जैसे सुरक्षित एसेट्स की मांग जोर पकड़ रही है। भारत जैसे आयातक देशों के लिए खतरा मंडरा रहा है।
भारत 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ब्रिकवर्क रेटिंग्स के राजीव शरण के अनुसार, कीमतों में तेजी से ईंधन महंगा होगा, महंगाई बढ़ेगी और चालू खाता घाटा चौड़ा होगा। आरबीआई की नीति प्रभावित हो सकती है।
शेयर बाजार सतर्क हो चुके हैं। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, वाहन-वित्त-ऊर्जा क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। जब तक तनाव रहेगा, कीमती धातुओं को बल मिलेगा।
तेहरान में नेतृत्व स्पष्टता, तनाव कम करने के कदम और होर्मुज खुलने का भरोसा ही राहत देगा। होर्मुज बंदी से ब्रेंट 90 डॉलर पार कर सकता है, युद्ध फैलने पर 100 डॉलर से ऊपर।
जेएम फाइनेंशियल के मुताबिक, तेल में प्रति डॉलर बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। लंबे संघर्ष से शिपिंग-बीमा लागत चढ़ेगी, खाड़ी मार्ग बाधित होंगे। बाजार तेल पर केंद्रित रहेंगे।