
नई दिल्ली में लोकसभा की राजनीति गरमा गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ मूल प्रस्ताव पेश कर सदन में हंगामा मचा दिया। उन्होंने 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सदस्यता समाप्ति का ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए राहुल की लोकसभा सदस्यता रद्द करने और भविष्य के चुनावों से अयोग्य घोषित करने की मांग की है।
यह विवाद तब भड़का जब राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस सौदे से देश के हितों का क्षय हो रहा है और ‘भारत माता को बेचा जा रहा है।’ सत्ताधारी दल के सांसदों ने तीखा विरोध जताया और उनके बयानों को असंसदीय बताते हुए रिकॉर्ड से हटाने की मांग की।
दुबे ने सोशल मीडिया एक्स पर 1978 के संसदीय दस्तावेज साझा किए। उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी की मारुति परियोजना की जांच में बाधा डालने, अधिकारियों को धमकाने के आरोप में विशेषाधिकार समिति ने इंदिरा को दोषी ठहराया था। 19 दिसंबर 1978 को मोरारजी देसाई सरकार के प्रस्ताव पर मतदान हुआ और इंदिरा को लोकसभा से निष्कासित कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। हालांकि 1981 में यह फैसला पलट गया।
मूल प्रस्ताव की प्रक्रिया स्पष्ट है—यह सदन की स्वतंत्र राय के लिए लाया जाता है, बहस होती है और अंत में वोटिंग। दुबे का कहना है कि राहुल ने सदन को भ्रमित किया और राष्ट्र-विरोधी तत्वों का साथ दिया। उन्होंने निजी सदस्य के रूप में प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद सरकार ने अपना कदम रोक लिया।
कांग्रेस ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। पार्टी का कहना है कि विपक्ष को सरकार की आलोचना का हक है, खासकर ऊर्जा और किसान मुद्दों पर। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पुष्टि की कि दुबे का प्रस्ताव प्राथमिक है।
यह टकराव लोकसभा की कार्यवाही को प्रभावित कर सकता है। क्या यह प्रस्ताव पारित होगा या मात्र शोरगुल साबित होगा, समय बताएगा। लेकिन इससे संसदीय विशेषाधिकारों की बहस जरूर तेज हो गई है।