
बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने एक चौंकाने वाले खुलासे में दावा किया है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से साफ इनकार कर दिया था। हाल ही में एक सार्वजनिक सभा में बोलते हुए त्रिवेदी ने नेहरू पर हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार को रोकने का आरोप लगाया, जो सदियों से लुटेरों द्वारा ध्वस्त होता आया।
अरब सागर तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर हिंदुओं के लिए गहन धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है। 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा नष्ट किए जाने के बाद भी यह विश्वास का प्रतीक बना। आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे राष्ट्रीय अभियान बनाया, ताकि सांप्रदायिक घाव भर सकें।
त्रिवेदी ने बताया कि पटेल को नेहरू का कड़ा विरोध झेलना पड़ा, जिन्होंने इसे विभाजनकारी बताया। ‘नेहरू ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण को नकार दिया,’ त्रिवेदी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा। पटेल की जिद से 1951 में मंदिर का उद्घाटन हुआ, लेकिन पर्दे के पीछे संघर्ष चला।
यह दावा नेहरू की धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदू पुनरुत्थान की बहस को हवा देता है। आलोचक इसे सैद्धांतिक रुख मानते हैं, तो समर्थक उपेक्षा। त्रिवेदी ने पटेल की एकजुट करने वाली सोच को नेहरू की तुष्टिकरण नीति से जोड़ा।
इतिहासकारों के अनुसार नेहरू 1951 समारोह में अनिच्छा से पहुंचे। पटेल के पत्र इस वैचारिक टकराव को उजागर करते हैं। आज बीजेपी इसे राजनीतिक हथियार बनाती है।
गुजरात में मंदिर से जुड़े आयोजन के बीच त्रिवेदी का बयान सोशल मीडिया पर आग उगल रहा। फैक्ट-चेकर अभिलेख खंगाल रहे, लेकिन मूल दावा इतिहास से मेल खाता। यह ईंट-पत्थर से परे विरासत की लड़ाई है।
विवाद भारत के संस्थापक दौर की विभाजन रेखाओं को रेखांकित करता है। नेहरू का इनकार सैद्धांतिक था या पूर्वाग्रही, इसने राष्ट्र की सांस्कृतिक धरती गढ़ी।