
1973 का मुंबई, जब राज कपूर अपनी फिल्म ‘बॉबी’ के लिए एक ऐसी आवाज़ की तलाश में थे जो मिट्टी की सोंधी खुशबू और आत्मा की गहराई लिए हो। चैरिटी शो में बुल्ले शाह गाते नरेंद्र चंचल ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो’ गाने ने चंचल को रातोंरात स्टार बना दिया और फिल्मफेयर अवॉर्ड भी दिलाया। लेकिन उनकी असली मंजिल वैष्णो देवी की वादियों में थी।
अमृतसर में 16 अक्टूबर 1940 को जन्मे नरेंद्र खरबंदा को उनकी चंचलता के कारण नाम मिला। मां कैलाश वती की भक्ति ने उन्हें संगीत का वारिस बनाया। मंदिरों की आरतियां उनके दिल में भक्ति का दीप जलाती रहीं।
आवाज़ खोने का संकट आया, लेकिन माता रानी की कृपा से लौटी आवाज़ पहले से शक्तिशाली बनी। यहीं से जीवन का लक्ष्य बदला।
चंचल ने जागरण को नया आयाम दिया। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज जैसी बुराइयों के खिलाफ मंच से आवाज़ उठाईं। ‘चलो बुलावा आया है’, ‘तूने मुझे बुलाया’ जैसे भजनों ने भक्त-भगवान का बंधन जोड़ा।
कटरा में 29 दिसंबर को उनका आगमन ‘चंचल मेला’ बन जाता। सर्दी में भीड़ उमड़ती। आज भी चढ़ाई पर उनकी धुनें थकान मिटाती हैं।
विदेशों में भी प्रसिद्धि। अमेरिका के जॉर्जिया ने सम्मानित किया। 2020 में ‘कित्थो आया कोरोना’ वायरल हुआ।
22 जनवरी 2021 को अलविदा। लेकिन ‘अंबे तू है जगदंबे काली’ हर घर में गूंजती है। ‘मिडनाइट सिंगर’ प्रेरणा देती है कि आस्था से सितारे छुए जा सकते हैं।