
दिल्ली की साकेत अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को आपराधिक मानहानि के पुराने मामले में बरी कर दिया है। यह फैसला 25 जनवरी को सुनाया गया, जिसमें अदालत ने अभियोजन पक्ष की नाकामी को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया। मामला दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा 2001 में दायर किया गया था, जब वे नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे।
अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने फैसले में कहा कि 2006 के एक टीवी कार्यक्रम में मेधा पाटकर द्वारा कथित मानहानिकारक बयानों का कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया। शिकायत में आरोप था कि पाटकर ने सक्सेना और उनके एनजीओ पर सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े ठेकों का लाभ उठाने का दावा किया था। लेकिन अदालत ने पाया कि पाटकर उस कार्यक्रम में लाइव पैनलिस्ट नहीं थीं, बल्कि केवल उनका एक छोटा प्री-रिकॉर्डेड वीडियो क्लिप दिखाया गया था।
यह मामला करीब 20 वर्ष पुराना है और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाए जाने वाले मुकदमों की एक कड़ी है। पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के जरिए लाखों विस्थापितों की आवाज उठाई है, जिसके चलते उन्हें कई कानूनी चुनौतियां झेलनी पड़ीं। साकेत कोर्ट का यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करता है और बिना प्रमाण के आरोपों को खारिज करने का उदाहरण पेश करता है।
वकीलों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा। मेधा पाटकर ने इसे न्याय की जीत बताते हुए अपने संघर्ष को जारी रखने की बात कही है। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत राहत है, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होता है।