
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के केरल को ‘केरलम’ नाम देने के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला कदम बताया। लेकिन उसी समय पश्चिम बंगाल का नाम ‘बांग्ला’ करने की मांग पर केंद्र की चुप्पी पर कड़ी नाराजगी जताई।
ममता ने केरलवासियों को हार्दिक बधाई दी। ‘यह फैसला उनकी मातृभाषा और संस्कृति का सम्मान करता है। हम सबको इससे सीखना चाहिए।’ लेकिन जल्द ही उनकी बात केंद्र की दोहरी नीति पर आ गई।
उन्होंने कहा कि कई राज्य अपने नाम आसानी से बदल लेते हैं, प्रस्ताव पास होते ही। लेकिन बंगाल के साथ ऐसा क्यों नहीं? राज्य विधानसभा ने दो बार प्रस्ताव पारित किए। हिंदी, बंगाली और अंग्रेजी में ‘बांग्ला’ को मंजूरी दी गई। फिर भी केंद्र खामोश।
मुख्यमंत्री ने ‘पश्चिम बंगाल’ के अंग्रेजी नाम की वजह से होने वाली परेशानी का जिक्र किया। ‘डब्ल्यू’ से शुरू होने के कारण छात्रों को परीक्षाओं में, नौकरीपेशाओं को साक्षात्कारों में और खुद उन्हें बैठकों में आखिरी नंबर मिलता है। ‘मुझे भी हमेशा अंत में बोलना पड़ता है।’
ममता ने बताया कि उन्होंने पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह से कई बार मुलाकात में यह मुद्दा उठाया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र बंगाली विरोधी रवैया अपना रहा है। ‘वे हमारे महान व्यक्तित्वों का अपमान कर रहे हैं। चुनाव में ‘बांग्ला’ का नारा लगाते हैं, लेकिन नाम नहीं बदलते।’
केरल के फैसले को भाजपा-सीपीआईएम गठजोड़ से जोड़ते हुए उन्होंने व्यंग्य किया, ‘अब उनका गठबंधन खुला हुआ है। बंगाल को हमेशा क्यों ठेंगा दिखाया जाता है?’
चेतावनी भरे लहजे में ममता बोलीं, ‘भाजपा की सत्ता हमेशा नहीं रहेगी। हम नाम जरूर बदलवा लेंगे।’ उन्होंने केंद्र से बंगाल की भावनाओं का सम्मान करने और तत्काल कदम उठाने की अपील की। यह विवाद राज्य की पहचान की लड़ाई बन चुका है।
