
हिमाचल प्रदेश के दुर्गम जिले लाहौल-स्पीति में पशुओं के प्रति क्रूरता पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। हिमालय की ऊंचाइयों में बसे इस क्षेत्र में पशु किसानों, पशु चिकित्सकों और अधिकारियों ने एकजुट होकर पशु कल्याण के लिए ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया।
बैठक में खच्चर, याक और घोड़ों पर अत्यधिक बोझ लादने, चोटिल पशुओं की उपेक्षा और कठोर मौसम में उनकी अनदेखी जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा हुई। जिलाधिकारी ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के सख्ती से पालन की बात कही। नियमित निरीक्षण, जागरूकता अभियान और वजन सीमा तय करने के प्रस्ताव पास हुए।
स्थानीय चरवाहों ने अपनी व्यथा साझा की। काजा के ताशी दोर्जे ने बताया कि पर्यटकों का सामान ढोते हुए पशु थककर चूर हो जाते हैं। बैठक में पशु कल्याण समिति गठित की गई, जो आकस्मिक जांच और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी।
एनजीओ के सहयोग से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बचाव केंद्र स्थापित होंगे। पर्यटन बढ़ने के साथ पशुओं की सुरक्षा आर्थिक रूप से भी जरूरी बताई गई। सब्सिडी पर पशु चिकित्सा सेवाएं और चारा भंडारण की योजना बनी।
समुदाय ने स्कूलों में पशु कल्याण को पाठ्यक्रम में शामिल करने का वादा किया। रोहतांग दर्रा खुलने से पहले ये कदम पशुओं के लिए राहत लेकर आएंगे। लाहौल-स्पीति अब पशु हितों की मिसाल बनेगा।