
राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि दलितों, वंचितों और कमजोर वर्गों के उत्थान की बातें अब नारों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरनी चाहिए। सामाजिक न्याय केवल शब्दों का जुमला नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा है, जिसकी रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है।
खड़गे ने ओडिशा की एक शर्मनाक घटना का जिक्र किया, जहां आंगनवाड़ी केंद्र तीन माह से बहिष्कृत है। कारण? भोजन एक दलित महिला द्वारा बनाया जा रहा है। कुछ समुदाय के लोग अपने बच्चों को वह खाना खाने से रोक रहे हैं। यह न केवल एक महिला का अपमान है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर सीधी चोट है।
आंगनवाड़ी बच्चों के विकास की नींव हैं। वहां जातिवाद की दीवारें खड़ी होंगी तो बच्चों के मन में नफरत के बीज पड़ेंगे। यह अनुच्छेद 21(क) और 47 का उल्लंघन है। खड़गे ने मध्य प्रदेश, गुजरात और चंडीगढ़ की घटनाओं का हवाला देकर बताया कि जातिगत पूर्वाग्रह संस्थागत स्तर पर फैला है।
अनुच्छेद 14, 15, 17 और एससी-एसटी एक्ट का हवाला देते हुए उन्होंने सरकार से त्वरित जांच, कड़ी कार्रवाई और जागरूकता अभियान की मांग की। बच्चों में समानता का संस्कार डालने के लिए आंगनवाड़ी जैसे स्थानों पर विशेष प्रयास जरूरी हैं। यह 21वीं सदी में सामाजिक एकता की असली परीक्षा है।