
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का खरदाहा विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक उथल-पुथल का प्रतीक है। दशकों तक वाम मोर्चा, खासकर माकपा का गढ़ रहे इस सीट पर 2011 से तृणमूल कांग्रेस का राज है। लेकिन 2026 के चुनावों में भाजपा, कांग्रेस और माकपा की त्रिकोणीय चुनौती ने ममता बनर्जी की पार्टी को सतर्क कर दिया है। जहां भाजपा पहली जीत की तलाश में है, वहीं कांग्रेस वापसी चाहती है और माकपा पूर्ण शक्ति से लौटने को बेताब।
हुगली नदी के पूर्वी तट पर बसा यह घनी आबादी वाला शहरी क्षेत्र कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण का हिस्सा है। 1877 में दक्षिण बैरकपुर और पश्चिम बैरकपुर नगरपालिकाओं से शुरूआत हुई, 1920 में दक्षिण बैरकपुर का नाम खरदाहा रखा गया। सियालदह-रानाघाट रेल लाइन शहर को रहारा (पूर्व) और खरदाहा (पश्चिम) में बांटती है। कोलकाता के एस्प्लेनेड, हावड़ा और बारासात से बसें आवागमन सुगम बनाती हैं।
उत्तर में टीटागढ़, पूर्व में पटुलिया-बांदीपुर, दक्षिण में पनिहाटी और पश्चिम में हुगली से घिरा खरदाहा धार्मिक केंद्रों से समृद्ध है। लक्ष्मी नारायण मंदिर, रस/श्यामसुंदर मंदिर और रहारा का रामकृष्ण मिशन बालकश्रम प्रमुख हैं। वार्षिक मेला लाखों श्रद्धालुओं को खींचता है।
17 विधानसभा चुनावों में 60 वर्षों तक वाम की जीत रही, 2011 से टीएमसी का दबदबा। 2021 में काजल सिन्हा विजयी रहीं, फिर सोवनदेव चट्टोपाध्याय ने उपचुनाव जीता। अब यह सीट 2026 की दहलीज पर सबसे रोमांचक जंग का मैदान बन चुकी है।