
उन्नीसवीं सदी के भारत में, जब औपनिवेशिक शासन और सामाजिक कुरीतियां देश को जकड़े हुए थीं, तब एक व्यक्ति ने आध्यात्मिक क्रांति की मशाल प्रज्ज्वलित की। केशव चंद्र सेन, जिन्हें ‘ब्रह्मानंद’ कहा जाता था, न केवल धार्मिक सुधारक थे, बल्कि वे एक ऐसे संत थे जिन्होंने भारतीय अध्यात्म को विश्व पटल पर पहुंचाया।
1838 में कलकत्ता के एक धनी बंगाली परिवार में जन्मे सेन का जीवन सुख-सुविधाओं से भरा था। लेकिन 19 वर्ष की आयु में ब्रह्म समाज से उनका परिचय हुआ तो सब बदल गया। देबेंद्रनाथ टैगोर के मार्गदर्शन में उन्होंने मूर्तिपूजा और अंधविश्वास के विरुद्ध अभियान चलाया।
सेन की वाक्पटुता अद्भुत थी। वे जनसभाओं में भाषण देकर हजारों को आकर्षित करते। महिलाओं की शिक्षा, विधवा विवाह और बाल विवाह विरोध जैसे मुद्दों पर उन्होंने क्रांतिकारी कदम उठाए। 1866 में इंग्लैंड यात्रा उनके जीवन का स्वर्णिम अध्याय बनी। वहां उन्होंने रानी विक्टोरिया सहित ब्रिटिश समाज को प्रभावित किया। ‘ब्रह्म धर्म विश्व का सार्वभौमिक धर्म है,’ उनका संदेश गूंजा।
देश लौटकर मतभेद उभरे। आदि ब्रह्म समाज से अलग होकर उन्होंने भारतवर्षीय ब्रह्म समाज की स्थापना की। नबविदhan नामक नया संप्रदाय शुरू किया, जिसमें सभी धर्मों का समन्वय था। लेकिन कूच बिहार के महाराजा से पुत्री का विवाह विवादास्पद रहा।
1884 में मात्र 49 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। फिर भी, उनकी विरासत जीवंत है। ब्रह्म समाज के मंदिर विश्वभर फैले हैं, और सामाजिक सुधारों में उनका योगदान अमर है। केशव चंद्र सेन सिद्ध करते हैं कि सच्चा आध्यात्म सीमाओं से परे होता है।