
कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को दोषसिद्ध कैदियों की जेल श्रम मजदूरी में भारी बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति सौमेन सेन और वी.एम. श्याम कुमार की बेंच ने 9 जनवरी के सरकारी आदेश को बरकरार रखा, जिसमें दैनिक मजदूरी 63-168 रुपये से बढ़ाकर 530-620 रुपये कर दी गई। इससे कैदी मासिक 15,000 से 18,600 रुपये तक कमा सकेंगे, जबकि भोजन-आवास जैसी सुविधाएं मुफ्त मिल रही हैं।
याचिकाकर्ता ए.के. गोपी ने दावा किया कि यह वृद्धि संवैधानिक रूप से गलत है, क्योंकि कैदी स्वतंत्र मजदूरों से बेहतर स्थिति में पहुंच जाएंगे। उन्होंने गुजरात मामले (1998) का हवाला दिया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेल मजदूरी प्रोत्साहन के लिए है, न्यूनतम वेतन के बराबर नहीं। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत अकुशल श्रमिकों को 15,000 रुपये मिलते हैं, बिना सब्सिडी के। स्थानीय प्रतिनिधियों का मानदेय भी कम है।
अदालत ने तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि अन्य वर्गों के वेतन न बढ़ने से कैदियों का न बढ़ाया जा सकता। सबके पास मांग का अधिकार है। जेल मजदूरी पुनर्वास का हिस्सा है, जो समाज में लौटने में मदद करती है। यह फैसला जेल सुधारों को नई दिशा देगा।