
देश में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है। उत्तर भारत में प्रह्लाद-होलिका की कहानी से जुड़ी होली के विपरीत, कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में यह पर्व भगवान शिव और कामदेव से संबंधित है। यहां रंगों की जगह राख का महत्व है, जो अहंकार नाश का प्रतीक बनी रहती है।
दक्षिण भारत का यह अनोखा मंदिर गर्भगृह में शिवलिंग के साथ कामदेव की मूर्ति स्थापित किए हुए है। मान्यता है कि होली पर दोनों के दर्शन से पापों का नाश होता है और अहंकार समाप्त हो जाता है। भक्तों की भारी भीड़ इस दिन मंदिर पहुंचती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, सती के देह त्याग के बाद शिव तप में लीन हो गए थे। सृष्टि संकट में पड़ने पर देवताओं ने कामदेव को भेजा। कामबाण से तप भंग हुआ, लेकिन क्रोधित शिव ने तीसरे नेत्र से कामदेव को राख कर दिया। यह कामदेव के घमंड का अंत था।
इसीलिए मंदिर में होली पर राख माथे पर लगाई जाती है। पांच दिनों तक चलने वाले उत्सव में चांदी के पालने और झूले चढ़ाए जाते हैं। संतानहीन दंपति चांदी का झूला अर्पित कर मनोकामना पूरी करते हैं।
यह परंपरा भक्तों को अहंकार त्यागने की सीख देती है, जो आधुनिक जीवन में भी प्रासंगिक है। कर्नाटक का यह मंदिर होली को एक आध्यात्मिक आयाम प्रदान करता है।