
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर इस समय दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ प्रशासन अनुशासन के बहाने तानाशाहीपूर्ण कदम उठा रहा है, वहीं वामपंथी छात्र संगठन अपना अवसरवादी स्वभाव उजागर कर रहे हैं। अभाविप के अनुसार, इनके बीच साधारण छात्रों की पढ़ाई और भविष्य दांव पर लग गया है।
जब अभाविप कार्यकर्ताओं पर भारी जुर्माने ठोके गए और निष्कासन की कार्रवाई हुई, तब जेएनयूएसयू ने चुप्पी साध ली। न कोई धरना, न विरोध। लेकिन आज उनके अपने सदस्यों पर सीपीओ मैनुअल के तहत निलंबन होते ही वे कक्षाओं का बहिष्कार कर परिसर को अस्थिर कर रहे हैं। यह उनके स्वार्थी संघर्ष को प्रमाणित करता है।
सीपीओ मैनुअल पर दोहरा चरित्र स्पष्ट है। लागू होने पर वामपंथियों ने प्रशासन के साथ इसका समर्थन किया, जबकि अभाविप ने शुरू से विरोध किया। इसे छात्र-विरोधी बताते हुए निरस्तीकरण की मांग की। आज वही गुट इसे तानाशाही कह रहे हैं। अभाविप अडिग है।
अभाविप अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा, “हम छात्रहित और लोकतंत्र के लिए सीपीओ का विरोध करते रहे। वामपंथी चुप रहे जब हम पर अत्याचार हुए, अब छात्रों को नुकसान पहुंचा रहे। हमारा संघर्ष सिद्धांतपरक है।”
मंत्री प्रवीण कुमार पीयूष बोले, “अभाविप कभी अराजकता का साथ नहीं देती। वामपंथी केवल अपने हित में सक्रिय होते हैं। प्रशासन की मनमानी और उनकी राजनीति दोनों गलत हैं।”
अभाविप छात्रों के हित में लड़ रही है, जेएनयू को राजनीतिक अराजकता से मुक्त करने के लिए।