
झारखंड में आदिवासी समुदायों के साथ हुई बंद कमरे की बैठक में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू धर्म को नई परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि यह कोई विशेष पूजा विधि नहीं, बल्कि सबका साथी जीवन जीने का तरीका है। विविधता में एकता पर जोर देते हुए भागवत ने भारत की पहचान को रेखांकित किया।
आरएसएस बयान के अनुसार, पूजा के ढंग अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु सभ्यता के मूल तत्व अटल हैं। दशकों के अनुभव से स्पष्ट है कि समाज को एकजुट होकर कार्य करना चाहिए। हमारी एकता विविधताओं के परे है।
‘हिंदू’ शब्द का सार जल, जंगल, खेती में बसता है। वेद-उपनिषद प्रकृति से प्रेरित हैं। अथर्ववेद विविधता का सम्मान सिखाता है, जहां धरती मां सभी का पालन करती है और हर भाषा का आदर होता है।
आदिवासी प्रतिनिधियों ने धर्मांतरण, पेसा नियमों की कमियां, सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दे उठाए। भागवत ने कहा, आदिवासी समस्याएं राष्ट्रव्यापी हैं। प्रधानमंत्री तक पहुंचाएंगे, समाधान ढूंढेंगे।
कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव ने पेसा पर आपत्ति जताई। ‘नियमों में प्रथागत कानून, रीति-रिवाजों का जिक्र नहीं। इससे आदिवासियों को भारी क्षति।’ 1996 का पेसा अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों के अधिकारों की रक्षा करता है, पर झारखंड के नए नियम कमजोर।
बैठक में पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन, बाबूलाल मरांडी आदि उपस्थित। शुक्रवार को आरएसएस नेतृत्व से भेंट के बाद भागवत का यह दौरा एकता का संदेश देता है।