हेमंत सोरेन का मार्मिक पोस्ट: जीवन के कठिन दौर
मैं अपने जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा हूँ। मेरे सिर से पिता का साया ही नहीं गया, बल्कि झारखंड की आत्मा का स्तंभ भी चला गया। मैं उन्हें सिर्फ 'बाबा' नहीं कहता था, वे मेरे मार्गदर्शक थे, मेरे...


मैं अपने जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा हूँ। मेरे सिर से पिता का साया ही नहीं गया, बल्कि झारखंड की आत्मा का स्तंभ भी चला गया।
मैं उन्हें सिर्फ 'बाबा' नहीं कहता था, वे मेरे मार्गदर्शक थे, मेरे विचारों की जड़ें थे, और उस घने जंगल की तरह थे जिसने हजारों-लाखों झारखंडियों को धूप और अन्याय से बचाया।
बाबा की शुरुआत बहुत ही साधारण थी। नेमा गांव के एक छोटे से घर में उनका जन्म हुआ था, जहाँ गरीबी और भूख थी, लेकिन हिम्मत भरपूर थी। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया। जमींदारी के शोषण ने उन्हें एक ऐसी आग दी जिसने उन्हें पूरी जिंदगी संघर्षशील बनाए रखा।
मैंने उन्हें हल चलाते देखा, लोगों के बीच बैठते हुए देखा। वे सिर्फ भाषण नहीं देते थे, बल्कि लोगों के दुख को जीते थे। बचपन में जब मैं उनसे पूछता था, “बाबा, आपको लोग दिशोम गुरु क्यों कहते हैं?” तो वे मुस्कुराते हुए कहते, “क्योंकि बेटा, मैंने सिर्फ उनका दुख समझा और उनकी लड़ाई को अपनी बना लिया।”
वो उपाधि न किसी किताब में लिखी गई थी, न ही संसद ने दी थी - वो झारखंड की जनता के दिलों से निकली थी। ‘दिशोम’ का मतलब समाज, और ‘गुरु’ का मतलब रास्ता दिखाने वाला। और सच कहूँ तो, बाबा ने हमें सिर्फ रास्ता नहीं दिखाया, बल्कि चलना सिखाया।
बचपन में मैंने उन्हें संघर्ष करते देखा, बड़े-बड़ों से टक्कर लेते देखा। मैं डरता था, लेकिन बाबा कभी नहीं डरे। वे कहते थे, “अगर अन्याय के खिलाफ खड़ा होना अपराध है, तो मैं बार-बार दोषी बनूंगा।”
बाबा का संघर्ष किसी किताब में नहीं समझा जा सकता। वह उनके पसीने में, उनकी आवाज में, और उनकी चप्पल से ढकी फटी एड़ी में था। जब झारखंड राज्य बना, तो उनका सपना साकार हुआ, लेकिन उन्होंने कभी सत्ता को उपलब्धि नहीं माना। उन्होंने कहा, “यह राज्य मेरे लिए कुर्सी नहीं, यह मेरे लोगों की पहचान है।”
आज बाबा नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज मेरे भीतर गूंज रही है। मैंने आपसे लड़ना सीखा, बाबा, झुकना नहीं। मैंने आपसे झारखंड से प्रेम करना सीखा, बिना किसी स्वार्थ के। अब आप हमारे बीच नहीं हो, लेकिन झारखंड की हर पगडंडी में आप हो। हर मांदर की थाप में, हर खेत की मिट्टी में, हर गरीब की आंखों में आप झांकते हो।
आपने जो सपना देखा, अब वह मेरा वादा है। मैं झारखंड को झुकने नहीं दूंगा, आपके नाम को मिटने नहीं दूंगा। आपका संघर्ष अधूरा नहीं रहेगा।
बाबा, अब आप आराम कीजिए। आपने अपना धर्म निभा दिया। अब हमें चलना है, आपके नक्शे-कदम पर। झारखंड आपका कर्जदार रहेगा। मैं, आपका बेटा, आपका वचन निभाऊंगा।
वीर शिबू जिंदाबाद - जिंदाबाद, जिंदाबाद। दिशोम गुरु अमर रहें। जय झारखंड, जय जय झारखंड।

