
जब ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन ने कहा ‘मेरे पास मां है’, तो सिनेमाघरों में सन्नाटा छा गया। जावेद अख्तर की यह पंक्ति न सिर्फ एक डायलॉग थी, बल्कि पूरे समाज के भावनाओं का आईना बन गई।
सलीम-जावेद जोड़ी ने 70 के दशक में बॉलीवुड को नया आयाम दिया। ‘जंजीर’ से शुरू हुई उनकी सफर ने गुस्सैल युवा का चेहरा अमिताभ को दिया। डॉकयार्ड के संघर्ष से अंडरवर्ल्ड के दंगों तक, हर डायलॉग में वास्तविकता झलकती थी।
‘शोले’ में गब्बर सिंह का ‘कितने आदमी थे?’ आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। बसंती की चुलबुली बातें, ठाकुर का बदला लेने का संकल्प—हर किरदार को जावेद ने अपनी आवाज दी।
‘दीवार’ के भाइयों के आमने-सामने के दृश्य ने ममता और त्याग की अनकही कहानी लिखी। ‘त्रिशूल’ में पिता-पुत्र का द्वेष, ‘डॉन’ में अंडरवर्ल्ड का ठाठ—हर फिल्म में नई ऊंचाइयां छुईं।
जावेद अख्तर की खासियत थी उनका शब्दों का लयबद्ध प्रवाह। छोटे-छोटे संवादों में तनाव, लंबे भाषणों में भावुकता। वे जानते थे कि असली डायलॉग वही है जो दर्शक याद रखें।
‘सिलसिला’ में रोमांस को दार्शनिक गहराई दी। आज भी इन डायलॉग्स का इस्तेमाल मीम्स, राजनीति, रोजमर्रा की बातचीत में होता है। जावेद अख्तर ने साबित किया कि शब्द सितारों से भी बड़े होते हैं।