
हिंदी साहित्य के महान कवि हरिवंश राय बच्चन का नाम सुनते ही ‘मधुशाला’ की पंक्तियां याद आ जाती हैं। 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद में जन्मे इस कवि ने कभी शराब का सेवन नहीं किया, फिर भी उनकी रचनाओं में नशे का ऐसा चित्रण है जो पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। ‘मधुशाला’ प्रकाशित होते ही विवादों में घिर गई। आलोचकों ने सवाल उठाया—जिसने शराब नहीं चखी, वह कैसे इसका वर्णन कर सकता है?
बच्चन का जीवन विद्वता और साहित्य साधना से भरा था। कैंब्रिज से डी.फिल. करने वाले इस कवि की पहली रचना ‘मधुवांति’ थी। लेकिन ‘मधुशाला’ ने उन्हें अमर बना दिया। उमर खय्याम की रुबाइयों से प्रेरित यह काव्य संग्रह जीवन की मधुरता और नश्वरता को दर्शाता है। साकी, प्याला, मधुशाला—ये प्रतीक दार्शनिक गहराई के वाहक बने।
विवाद तब भड़का जब शराब-विरोधी समूहों ने बच्चन पर तीखे प्रहार किए। कवि ने जवाब दिया कि कविता व्यक्तिगत अनुभव से परे होती है। बहस चरम पर पहुंची तो महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप किया। एक सभा में गांधीजी ने कहा, ‘यह शराब का गुणगान नहीं, जीवन का दर्शन है।’ उनके इस बयान ने आलोचकों को खामोश कर दिया।
बच्चन की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ और रामायण पर ‘रामचरितमानस’ अनुवाद उनकी अमूल्य निधि हैं। अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में भी प्रसिद्ध, वे 2003 तक सक्रिय रहे। आज भी ‘मधुशाला’ की महफिलें सजती हैं, जो सिद्ध करती हैं कि सच्चा नशा शब्दों का होता है।