
गर्मी की दस्तक के साथ गुजरात के नर्मदा जिले के जंगलों में पलाश के फूलों ने चमकीली नारंगी चादर बिछा दी है। स्थानीय भाषा में खाखरा कहे जाने वाले ये पेड़ पर्यटकों को मोहित कर रहे हैं और ग्रामीणों, खासकर महिलाओं की जिंदगी में नई रौनक ला रहे हैं।
मौसम बदलते ही हरियाली कमजोर पड़ जाती है, लेकिन पलाश अपने चटखारे फूलों से अलग पहचान बनाता है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास ये दृश्य किसी चित्रकार के कैनवास सरीखे लगते हैं, जो गर्मियों में इलाके को और आकर्षक बना देते हैं।
एकता नगर की एकता नर्सरी में महिलाएं हैंडीक्राफ्ट और हर्बल सामान बेच रही हैं। पलाश के फूलों से बने साबुन की मांग आसमान छू रही है, जिससे महीने में 40 से 50 हजार रुपये की कमाई हो रही है।
केवड़िया की नीरू तड़वी राधे कृष्ण मिशन मंगलम ग्रुप की प्रमुख हैं। 2022 में 10 सदस्यों से शुरू हुआ यह समूह अब आत्मनिर्भर है। उन्होंने बताया, “पहले खेती-मजदूरी करते थे। सरकारी सहायता से 70 हजार का लोन लेकर दुकान खोली। अब घर से दूर काम की तलाश खत्म।”
साबुन बनाने की ट्रेनिंग से विविधता आई। नींबू, एलोवेरा, गुलाब वाले साबुन बनते हैं। स्टैच्यू आने वाले सैलानी खरीदते हैं, जिससे हर सदस्य को 10-15 हजार महीने में मिलते हैं।
कोठी गांव की सुमित्रा तड़वी बोलीं, “मजदूरी छोड़ केसुड़ा साबुन से लाभ।” पलाश ने न केवल प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ाया, बल्कि महिलाओं के लिए टिकाऊ आय का स्रोत भी बनाया।