
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में डॉ. गंगूबाई हंगल का स्थान अमिट है। कर्नाटक की इस महान गायिका ने किराना घराने को अपनी गहन स्वर साधना से नई ऊंचाइयां दीं। समाज की बेड़ियां तोड़ते हुए उन्होंने पूरे देश और विदेशों में ख्याति अर्जित की, कर्नाटक का मान बढ़ाया।
दादी कर्नाटकी संगीत गाती थीं, लेकिन गंगूबाई का मन हिंदुस्तानी में लगा। कुदगोल पहुंचकर उन्होंने सवाई गंधर्व से दीक्षा ली, जिनकी कठोर ट्रेनिंग ने उन्हें उस्ताद बनाया।
पंडित भीमसेन जोशी से उनका गुरुभाई बंधन अनोखा था। जोशी उन्हें ‘अक्का’ कहते, स्टेशन पर या पानी भरते वक्त रागों पर सवाल पूछते—’अक्का, ये राग गुरुजी ने कैसे सिखाया?’ गंगूबाई सब सिखा देतीं, संगीत की एकता का प्रतीक बनीं।
उनके गायन के बाद मंच पर उतरना कठिन माना जाता था। इतना सरल व्यक्तित्व, परिवार का साथ—मुंबई से दिल्ली, कोलकाता और फ्रांस तक उनका जलवा छाया।
संगीत को जीवनरूपी समर्पित कर हुबली में डॉ. गंगूबाई हंगल गुरुकुल बनवाया। अपने कष्टों से सबक लेते हुए येदियुरप्पा से 5 करोड़ मांगे, तत्काल मिले। 12 वर्षों से यह एकमात्र सरकारी गुरुकुल गुरु-शिष्य परंपरा निभा रहा, प्रतिभाएं जन्म दे रहा—कर्नाटक की शान।
पद्म विभूषण उनके आगे फीके। चौथी कक्षा तक की पढ़ाई से वैश्विक सम्मान तक का सफर। मैसूर यूनिवर्सिटी, हुबली गुरुकुल, धारवाड़ पीठ—उनकी देन।