
उर्दू साहित्य के अमर शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा था। मुंहफट स्वभाव, गहरी मोहब्बत के दर्द और जीवन दर्शन से ओतप्रोत उनकी शायरी आज भी दिलों को छू जाती है। भगवद्गीता से प्रेरित उनकी रचना ‘नगम-ए-हकीकत’ उर्दू में आध्यात्मिक गहराई का अनमोल नगीना है। 1896 में गोरखपुर जन्मे फिराक का निधन 1982 में दिल्ली में हुआ।
1918-19 से शायरी का सफर शुरू कर 1930 तक उन्होंने सैकड़ों गजलें, रुबाइयां और नज्में रचीं। उस दौर में उर्दू को सच्चाई, जज्बात, वतनप्रेम और प्रकृति का नया रंग मिला। उनकी आवाज में एक अनोखी कसक घुली जो अमर हो गई।
आजादी की लड़ाई में भी फिराक आगे रहे। सिविल सेवा की नौकरी छोड़ असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में कूद पड़े। ब्रिटिश राज ने उन्हें आगरा जेल में 15 महीने ठूंसा। वहां मुशायरे में उनका शेर ‘अहल-ए-जिंदा की यह महफिल…’ आज भी गूंजता है। नेहरूजी के आमंत्रण पर कांग्रेस में अवर सचिव बने।
1918 में पड़ी एक ऐसी मोहब्बत ने 12-13 साल बेचैन रखा। तन्हाई, इंतजार, जुदाई के उनके इश्किया शेरों में आध्यात्मिक आंच की गहराई है। परिवार के दुख—पिता मुंशी गोरख प्रसाद का इंतकाल, भाइयों की असमय मौत—नज्मों में मार्मिक रूप से उभरे।
गीता के उपदेशों को उर्दू में ढाल ‘नगम-ए-हकीकत’ में फिराक लिखते हैं—सारी सृष्टि उनके नूर की किरणें, पांडवों का सब्र, बदर की जांबाजी, राम का वनवास, करबला की कुर्बानी सब उनके दम से कायम।
1924 में इलाहाबाबाद में वतनप्रेमी गजल रची। सम्मानों में साहित्य अकादमी, पद्म भूषण, ज्ञानपीठ शामिल। फिराक का जीवन शायरी, संघर्ष और शिक्षा का अनुपम संगम है, जो आज प्रेरणा देता रहता है।