
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर विज्ञान भवन में ‘भारती: नारी से नारायणी’ राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन महिलाओं के उत्थान पर गहन पैनल चर्चा हुई। पूर्व राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा, संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा और कलारीपयट्टू विशेषज्ञ डॉ. एस. महेश ने विचार साझा किए।
सिन्हा ने 1921 की जनगणना के भयावह आंकड़ों का जिक्र किया—एक साल से कम उम्र की 597 और 2-4 साल की 494 बाल विधवाएं। ‘आज हम तर्कसंगत पीढ़ी तक पहुंचे हैं,’ उन्होंने कहा। ‘लड़कियों को मार्शल आर्ट्स जरूर सिखाएं, लेकिन चेतना जगाने के लिए तर्क की शक्ति पर जोर दें।’
डॉ. पुरेचा ने कहा, ‘अच्छे लोग, समाज और कला—ये सब महिलाओं की शक्ति के बिना अधूरे हैं। ‘नारी, तुम नारायणी हो’ हमारी परंपरा का सार है। कला को संवेदनशीलता जगाने का माध्यम बनाएं, न कि सिर्फ तकनीक।’
डॉ. महेश ने देवी-देवताओं के शस्त्रों का उदाहरण दिया। ‘योद्धा शक्ति छिपी है, लेकिन डर ने उसे दबा दिया। इतिहास की रानियां दुश्मनों को खदेड़ती थीं। नारी को नारायणी बनाने का यही मार्ग।’
यह चर्चा महिलाओं को शारीरिक, मानसिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाने का संदेश देती है।