
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन सादगी, त्याग और देशभक्ति का प्रतीक है। बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में 1884 में जन्मे इस महान सपूत की शनिवार को पुण्यतिथि है। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत व फारसी के प्रकांड पंडित थे, जिन्होंने बाल्यकाल से ही उन्हें ज्ञान का मार्ग दिखाया।
पांच वर्ष की आयु में फारसी सीखना शुरू करने वाले प्रसाद जी छपरा जिला स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज पहुंचे। 1902 में इंटरमीडिएट प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर रॉबर्ट फेलोशिप पाई। अर्थशास्त्र में एमए, विधि में स्वर्ण पदक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम डॉक्टर ऑफ लॉ—उनकी विद्वता लोहमानि थी।
वकालत में सफलता के बावजूद राष्ट्रसेवा ने उन्हें बुलाया। 1920 के असहयोग आंदोलन में गांधीजी से प्रेरित होकर वकालत त्याग दी। चंपारण, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो जैसे अभियानों में अग्रणी भूमिका निभाई। जेलयात्राओं से कभी डिगे नहीं।
कांग्रेस अध्यक्ष कई बार, संविधान सभा के कुशल सभापति। 26 जनवरी 1950 को प्रथम राष्ट्रपति बने, दो कार्यकाल पूरे किए। राष्ट्रपति भवन में भी खादी, शाकाहार, प्रार्थना का सादा जीवन। 10,000 का वेतन आधा लिया, बाद में घटाकर 2500। उपहार अस्वीकार, स्वयं कार्य。
अवकाश के बाद विदेशी उपचार ठुकराकर पटना के जर्जर मकान लौटे। सदाकत आश्रम में 28 फरवरी 1963 को अंतिम सांस। बिहार विद्यापीठ में स्मृति संग्रहालय। देशरत्न की गाथा प्रेरणा स्रोत।