
भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास में राजा राममोहन राय के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम है महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर का। 1817 में कोलकाता के धनी टैगोर परिवार में जन्मे देवेंद्रनाथ ने ब्रह्म समाज को नई दिशा दी और आधुनिक भारत के आध्यात्मिक आधार तैयार किए।
राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी, जो मूर्तिपूजा और अंधविश्वास के विरुद्ध था। उनके 1833 में निधन के बाद समाज अनाथ-सा हो गया। 22 वर्ष की युवावस्था में देवेंद्रनाथ ने इस जिम्मेदारी को संभाला।
1839 में ब्रह्म समाज में शामिल होकर उन्होंने तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना की। 1843 में दोनों संगठनों का विलय कर उन्होंने ब्रह्म समाज को मजबूत संगठन बनाया। उनका ‘ब्रह्म धर्म’ ग्रंथ ब्रह्म समाज का बाइबिल बन गया।
महर्षि ने एकेश्वरवाद, नैतिकता और सामाजिक सुधारों पर बल दिया। उन्होंने विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा और जाति उन्मूलन के पक्ष में अभियान चलाया। जोरासंको स्थित उनके घर में साहित्यिक और दार्शनिक चर्चाओं का केंद्र बन गया।
उनके पुत्र रवींद्रनाथ टैगोर को भी यहीं प्रेरणा मिली। महर्षि स्वयं प्रातःकालीन ध्यान के लिए प्रसिद्ध थे। 1866 में आदि ब्रह्म समाज मंदिर का निर्माण उनकी सादगी का प्रतीक था।
केशवचंद्र सेन के साथ मतभेद के कारण समाज में विभाजन हुआ, फिर भी महर्षि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। 1905 तक जीवित रहकर उन्होंने देखा कि कैसे उनके कार्यों ने बंगाल पुनर्जागरण को नई ऊँचाई दी।
आज जब धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है, महर्षि का संदेश प्रासंगिक है – तर्कसंगत आस्था ही सच्चा धर्म है। राममोहन राय की विरासत को उन्होंने अमर बना दिया।