
दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं के निपटारे में हो रही लंबी देरी पर गहरी चिंता जाहिर की है। अदालत ने साफ कहा कि ऐसी याचिकाओं को अनावश्यक रूप से लटकाना जेल में बंद आरोपी के लिए मानसिक यातना के समान है और यह उसके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है।
यह टिप्पणी 2021 के एक हत्या मामले में आरोपी अमीर की जमानत याचिका पर आई। सीमापुरी थाने में आईपीसी की धारा 302, 307 व 34 के तहत दर्ज मामले में न्यायमूर्ति गिरिश कथपलिया की एकलपीठ ने फैसला सुनाया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना वाले दिन शिकायतकर्ता अनीस व उनके साथी सुबहान, सोहैल, अर्शद व समीर बैठे थे। तभी तीन आरोपी आए और विवाद हो गया। सहआरोपी ने शोएब को चाकू मार दिया, जिसकी मौत हो गई। सोहैल के बीच-बचाव करने पर उस पर भी हमला हुआ। अमीर पर सोहैल को पीछे से पकड़ने का आरोप है।
अमीर 24 अक्टूबर 2021 से हिरासत में है। उसके वकील ने बताया कि याचिका ट्रायल कोर्ट में 25 महीने लंबित रही। हाईकोर्ट में भी सुनवाई में देरी हुई। घायल गवाह सोहैल ने ट्रायल में गवाही दे दी है।
अभियोजन ने जमानत का विरोध किया, लेकिन माना कि सभी सार्वजनिक गवाहों की शहादत हो चुकी है। अदालत ने देरी को अस्वीकार्य ठहराते हुए कहा कि जमानत याचिकाएं सत्र व हाईकोर्ट दोनों में इतने लंबे लटकना गंभीर समस्या है।
न्यायमूर्ति ने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए जोर दिया कि लंबित रहना ही आरोपी को सजा दे देता है। लंबी हिरासत व ट्रायल की प्रगति को देखते हुए अमीर को 10,000 रुपये की व्यक्तिगत जमानत व समान राशि की एक जमानतदार पर रिहा करने का आदेश दिया।
आदेश की प्रति जेल अधीक्षक को तत्काल भेजने के निर्देश दिए गए। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता पर बल देता है।