
मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर पर गहरा आघात पहुंचा है। दरभंगा रियासत की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। नरगोना पैलेस में उनका अंतिम सफर समाप्त हुआ, जिससे पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
कामसुंदरी देवी का जन्म कुलीन परिवार में हुआ था। 1946 में वे महाराजा कामेश्वर सिंह की पत्नी बनीं। स्वतंत्र भारत में रियासत समाप्त होने के बाद भी उन्होंने राजघराने की परंपराओं और दानशीलता को जीवंत रखा। शिक्षा, कला और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान अविस्मरणीय हैं।
मैथिली साहित्य और शास्त्रीय संगीत की संरक्षक रहीं महारानी ने दरभंगा में अनेक स्कूल व अस्पताल स्थापित किए। छठ पूजा और काली पूजा जैसे त्योहारों में उनकी भक्ति लाखों को प्रेरित करती थी। वृद्धावस्था में भी वे मिथिला की लोककलाओं को संरक्षित करती रहीं।
निधन की खबर से राजपरिवार व आमजन स्तब्ध। झंडे आधे तले लहरा रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत अनेक ने श्रद्धांजलि दी। कल राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा।
महारानी का जाना एक युग का अंत है। उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं मिथिला की उन्नति का आधार बनी रहेंगी। शोक में डूबे मिथिला के लोग उनकी सादगी व उदारता को हमेशा याद रखेंगे।